ईद में कब शुरू हुआ सेवई खाने-खिलाने का रिवाज

रमजान का पवित्र महिना का आज अंतिम दिन है और कल ईद है। इस खास मौके पर सभी लोग नये-नये कपडे पहनकर ईदगाह जाते है और ईद की नमाज अदा करते है। जब बात ईद की हो तो सेवई का जिक्र ना हो, यह कैसे हो सकता है। दरअसल सवई चीज ही ऐसी है कि अमीर हो या गरीब, राजा हो या रंक इस दिन सेवई से ही मेहमानों का स्वागत करता है।

  • सेवई के बिना ईद अधूरी

रांची के बाजारों में रंग-बिरंगे कई प्रकार की सेवई मौजूद है। लोग भी बड़े ही चाह के साथ इसे खरीद रहे हैं। वहीं, ईद तो सेवई के बिना अधूरी मानी जाती है। ईद के दिन पूरे देश में हर घर में सेवई बनाई जाती है। जाफरान और मेवे के साथ-साथ मलाई और दूध का इस्तेमाल इसे बेहद लजीज बना देता है। लोग एक दूसरे के घर मुबारकबाद देने जाते हैं और सेवई खाते हैं।

  • नूरजहां से संबंधित है ईद पर सेवई खाने-खिलाने का इतिहास

अगर हम बताएं कि सेवई का ताल्लुक ईद से नहीं है तो चौंकिएगा नहीं। दरअसल, सेवई का ताल्लुक नूरजहां से है, जिन्होंने हिंदोस्तान में ईद पर सेवई बनाने का रिवाज बनाया। ईद में सेवई की ताल्लुक खुशी से है और मिठास से। यही वजह है कि इस दिन सेवई से लोगों का मुंह मीठा किया जाता है। सबसे पहली बार नूरजहां ने सेवई बनाने की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे मुगल सूबेदारों के साथ सन 1660 तक सेंवई पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैल गई। इस तरह धीरे-धीरे ईद का सेवई से खास रिश्ता हो गया। यूं तो ईद के दिन सेवई बनाने का रिवाज हिंदोस्तान में ही प्रचलित हुआ। हालांकि, ईरान में भी सेवई बनाई जाती है।

  • आम तौर से सेवई को शाही डिश माना जाता है

वैसे तो सेवई को आम तौर से शाही डिश मना जाता है, लेकिन इसकी पहुंच खास लोगों से लेकर आम लोगों तक है। पुराने दौर में इसे बनाने में खासी मशक्कत करनी पड़ती थी, सेवई हाथ से बनाई जाती थी, जिसकी क्वॉलिटी और लज्जत का कोई तोड़ नही थी। बदलते दौर के साथ ही मशीनों के इस्तेमाल ने इसका मजा जरा कम कर दिया है।

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