आइये जानते है छिपकली के जीवन के बारे में रोचक बातें

रात्रि को जलते हुए बल्ब व ट्यूब लाइट के आसपास प्रकाश की ओर आकर्षित होकर तिलचट्टड्ढे, कीट जब मंडराने लगते हैं तब चुपके से फुर्ती से छिपकली वहां आकर उनको खाकर अपने पेट की तृप्ति को शांत कर लेती है। छिपकली मकान की छत व दीवार पर उल्टा लटककर चलती है लेकिन वह नीचे नहीं गिरती ऐसा प्रश्न आपके दिमाग में जरूर आता होगा।

उसका उत्तर यह है कि ‘छिपकलियों के चपटे पैरों के तलुओं में असंख्य हुक यानी अंकुसियां होती हैं जो छत व दीवारों को कसकर पकड़ लेती है इसी खूबी के कारण वह नीचे नहीं गिरती। दूसरा कारण यह भी है कि छिपकली के पादांगुलियों के सिरे पर प्यालेनुमा अवनमन जब छतों, दीवारों पर दबाये जाते हैं तब उनके दोनों के बीच वायु शून्य होने के कारण ही वह दीवार से चिपकी रहती है और नीचे नहीं गिरती। छिपकली अपनी बिना पलक वाली आंखों के चमचमाते प्रकाश व अंधेरे में भी सरलता से देखते हुए धीरे-धीरे शिकार के निकट पहुंचकर तीव्र गति से लपककर उन्हें मुंह में दबोचकर खा जाती है।

सूखे शल्क से ढके शरीर और ऊपरी सतह पर कांटे वाली छिपकलियों का शरीर का तापमान वातावरण के अनुसार बदलता रहता है और ये भी रेंगने वाले प्राणियों की तरह ठंडे खून का जीव होती हैं जो सूरज की किरणों से धूप सेवन करके अपने शरीर को गरम कर लेती हैं। गर्मी के मौसम में मादा छिपकलियां नम भूमि व दीवारों की दरारों में छोटे-छोटे सफेद रंग के गोल व कठोर कवच से ढके अंडे देती हैं। सूरज की किरणों से अंडे सेये जाते हैं। 50 से 70 दिनों के बाद अंडे फूटते ही पूर्ण विकसित बच्चे मां-बाप के आधे आकार के बाहर निकल आते हैं।

चलने-फिरने के योग्य बच्चे स्वयं भोजन की तलाश करके अपनी देखभाल भी कर लेते हैं। इनके दो जोड़े पैदा होते हैं जिनके सिरों पर पंजे होते हैं। माता-पिता व संरक्षक की देखभाल के बगैर ही बच्चे पलकर बड़े हो जाते हैं और इनकी वंशवृद्धि होती रहती है।

कई डरपोक प्रवृत्ति वाले छिपकलियों से भयभीत होकर चिल्लाते हैं और शिकारी इनको मारना चाहते हैं तब छिपकली अपने प्राण की रक्षा करने के लिए अपनी पूंछ तोड़कर फेंक देती है, जब शिकारियों की नजर पूंछ पर पड़ती है तब छिपकली उनका ध्यान भंग करके सुरक्षित स्थान में जाकर छिप जाती है।

Loading...
loading...
Comments